लोकतंत्र की मज़बूती है स्वतंत्र पत्रकारिता

लोकतंत्र की मज़बूती है स्वतंत्र पत्रकारिता

(शिब्ली रामपुरी)

हाल ही में मीडिया पर कानूनी शिकंजा कसने के कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिससे साफ पता चलता है कि सत्ता में बैठे या फिर कुछ दबंग किस्म के लोग मीडिया की आवाज को किसी ना किसी तरह से दबाना या कमजोर करना चाहते हैं. जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता. दिल्ली में काफी समय से किसान आंदोलन चल रहा है और इस आंदोलन की कवरेज करने के दौरान यूं तो मीडिया को पहले ही काफी परेशानियों से रूबरू होना पड़ रहा था और कई पत्रकारों को तो भारी परेशानियों के दौर से गुजरने को मजबूर होना पड़ा लेकिन हाल ही में कुछ ऐसी खबरें विचलित कर देने वाली है कि कई पत्रकारों पर कानूनी शिकंजा कस दिया गया. उनके खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए तो कई पत्रकारों को जेल की सलाखों के पीछे भी डाल दिया गया. पत्रकारों की रिहाई के लिए दिल्ली समेत कई जगहों पर पत्रकारों ने आवाज भी बुलंद की. दिल्ली में तो बाकायदा पत्रकारों ने काफी संख्या में इकट्ठे होकर उनकी रिहाई की मांग को लेकर प्रदर्शन तक किया.देश में यदि मीडिया की बात की जाए तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इसकी काबिले तारीफ लोकतांत्रिक व्यवस्था की पूरी दुनिया में मिसाल दी जाती है और मिसाल यूं ही नहीं दी जाती है इसकी कई वजह हैं. जिनमें एक प्रमुख वजह यह है कि यहां पर मीडिया को पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना काम करने की आजादी हासिल है और वह इस स्वतंत्रता के तहत कार्य भी करता रहा है लेकिन हाल ही में जिस तरह से कई पत्रकारों पर कानूनी शिकंजा कस दिया गया और कई पत्रकारों को ईमानदारी से पत्रकारिता के कर्तव्यों का निर्वाहन करने पर जेल की सलाखों तक के पीछे डाल दिया गया उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है.जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था की पूरी दुनिया में मिसाल कायम हो और जो हकीकत में सबको बराबर का अधिकार देती हो और जिसमें मीडिया को पूरी आज़ादी से अपना काम करने की आजादी हासिल हो ऐसी व्यवस्था में पत्रकारों पर कानूनी शिकंजा कस देना या उनकी आवाज को दबाना या कमजोर करना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता. पत्रकारों की सुरक्षा और उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में पूर्व की कांग्रेस सरकार ने भी काफी वायदे किए और मौजूदा दौर की भाजपा सरकार ने भी काफी वायदे किए लेकिन यह कितने बुनियादी तौर पर पूरे हुए इसके बारे में ज्यादा कुछ कहने और लिखने की जरूरत नहीं है. कोरोना काल के दौरान काफ़ी संख्या में पत्रकारों की नौकरियां चली गई और उनको बेरोजगारी का सामना करना पड़ा और आज भी काफी संख्या में पत्रकार बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ लघु छोटे समाचार पत्रों या कुछ टीवी चैनलों में कार्य करने वाले पत्रकारों की ही साथ हुआ हो बल्कि देश के कई मुख्य समाचार पत्रों और मीडिया चैनलों के पत्रकारों की छंटनी कर दी गई और उनको नौकरी से निकाल दिया गया. ऐसे पत्रकारों के सामने आज भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा है लेकिन अफसोस सरकार की ओर से इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाए गए. सरकार ने कोरोना संकट के दौरान युं तो बहुत सहायता जनता की की लेकिन क्या इस में पत्रकार भी शामिल थे?
इन हालातों को देखते हुए पत्रकारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और उनको और ज्यादा स्वतंत्रता देने की दिशा में सरकार द्वारा कदम उठाए जाने अत्यंत जरूरी है और यह भारत जैसे काबिले तारीफ देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी बेहद फायदेमंद है. लोकतंत्र में पत्रकारों का ज्यादा से ज्यादा स्वतंत्र तरीके से कार्य करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती की दिशा में एक कारगर कदम होता है. इसलिए जरूरी है कि सरकार इस ओर गंभीरता से ध्यान देकर ऐसे कदम उठाए कि जिससे पत्रकारों को आर्थिक परेशानियों के दौर से ना गुजरना पड़े और उनको कार्य करने में किसी भी तरह की बाधा ना उत्पन्न हो जैसा कि दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान कुछ पत्रकारों को परेशानियों के दौर से गुजरने को मजबूर होना पड़ा है. पत्रकारिता करना हर दौर में चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है और वर्तमान दौर में भी पत्रकारों के सामने किसी तरह की चुनौतियां कम नहीं है. ऐसे में ईमानदारी से कार्य करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत किए जाने की बेहद जरूरत है.

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