“मांद पड़ती कंगना”

“मांद पड़ती कंगना”

कमल देवबन्दी,लेखक विचारक

आज के इस संक्षिप्त लेख की मेरी दो भूमिकाएं हैं या यह कहिए कि दो प्रस्तावना हैं ।ऐसा कम होता है किसी भी लेख में पहला पैराग्राफ यह बता देता है कि लेखक क्या कहना चाह रहा है।
लेकिन जिस तरह के आजके हालात हैं उनमें यह भूमिका लिखना मजबूरी हो गई है ।
मैं यह समझता हूं के इंसान को सजने सवरने के लिए सबसे ज्यादा किरदार की जरूरत होती है ।आप अच्छे हैं ,सच्चे हैं ईमानदार हैं ,यकीन जानिए मरने के बाद भी आपको दुनिया हजारों साल तक याद रखेगी ।इसकी दुनिया के अंदर बहुत मिसाले हैं। अल्लाह रब्बुल इज्जत ने थोड़े थोड़े वक्त के बाद ऐसे लोगों को दुनिया में भेजा कि वह नुमाइंदा शख्सियत बनी यह अल्लाह की मसलेहत भी थी ।दुनिया के अंदर नबियों का आना इस चीज की सबसे बड़ी दलील है कि उसने आपको राहे रास्त पर लाने के लिय नबियों को जमीन पर भेजा।
इंसान ने जैसे जैसे तरक़्क़ी की उसने अपने लिबास ,अपनी खूबसूरती अपनी सजावट के लिए तरह-तरह की चीजों की ईजाद की जिनमें जेवर भी महत्वपूर्ण है। उस जेवर में ,एक जेवर कंगन यानी कंगना के नाम से भी आता है ।जिसको औरतें हाथों में पहनती हैं जो आकर्षण का केंद्र रहता है।
मगर आज कंगना नाम की एक महिला अपनी जबान, अपने ट्वीट और अपने लहजे से समस्त समाज में एक द्वेष फैलाना चाह रही है ।जबकि हकीकत यह है कि कंगना सजने सवरने के लिए होता है ।मगर इस लड़की ने अपने नाम को सार्थक न करते हुए एक विपरीत छवि प्रस्तुत कर दी है ।कितने अफसोस की बात है कि बॉलीवुड की नायिका जिसके पास दौलत, शोहरत और सम्मान भी हैं ।मगर इसने उस रास्ते को चुना जिस पर सिवाए दिलों में नफरत बिठाने के कोई दूसरी चीज पनप नहीं सकती।
आज की तारीख में अगर कंगना रानावत को देख जाए उसके पास किसी चीज की कोई कमी नहीं है ।मगर दिमागी दिवालियापन ने उसको इस मुकाम तक पहुंचा दिया है कि वह आज उन लोगों के हवाले से ट्वीट कर रही है जिनको लगभग 70 साल से पूरी दुनिया बुराई के प्रतीक के रूप में देख रही है और आज उसने अपनी दलील में जो बातें कहीं उससे यह साबित होता है कि पिछले 70 साल में हिंदुस्तान का सभ्य, शिक्षित और नेतृत्व करने वाला समाज गलत था ।
मुमकिन है इन बातों से उसे कुछ आंशिक लाभ हो जाए मगर ये यकीन जानिए कि आने वाले समय में देश की नई पीढ़ी ऐसे लोगों को क़तई तोर पर माफ नहीं करेगी ।
हिंदी फिल्मों की उम्र 100 साल के करीब है ।हिंदी फिल्में हमेशा से भारत के अंदर मनोरंजन का सरल साधन रही हैं और हिंदी फिल्मों ने आर्थिक ,सामाजिक, राजनीतिक ,शैक्षिक मुद्दों के साथ-साथ प्रेम प्रसंग, देश की आजादी और हर विषय पर अपने विचारों को इस तरह प्रस्तुत किया कि वह फिल्में भारतीय समाज का आईना बन गई ,आप मदर इंडिया देखिए, मुग़ल-ए-आज़म ,उपकार आनंद ,चुपके चुपके, गर्म हवा, पाक़ीज़ा ,उमराव जान, लैला मजनू ,जय संतोषी मां, मेरे महबूब ,मेरे हुजूर ,गोदान ,2 बीघे जमीन ,मेरे अपने ,बंदिनी ,गुमराह,हमराज़,धर्म पुत्र,हजारों फिल्में ऐसी हैं जिन्होंने समाज का नेतृत्व किया ।
कलाकार किसी भी रूप में हो लेखक हो ,शायर हो ,साहित्यकार हो, इतिहासकार हो, गीतकार हो, पत्रकार हो ,निर्माता व निर्देशक हो उसका कोई धर्म और जाति नहीं होती ।उसको जो चरित्र दे दिया जाता है वह उस चरित्र को मंच या पर्दे पर सार्थक कर देता है और ऐसा लगने लगता है कि अकबर ए आज़म पृथ्वीराज कपूर ही हों। लेकिन वर्तमान के अंदर हमारे कुछ कलाकार ऐसे हैं जो धार्मिक उन्माद को बढ़ावा दे रहे हैं। और संकीर्ण विचार रखकर कला के बीच धर्म और जाति की दीवार खड़ा कर रहे हैं। यह अफसोस की बात है और इसकी निंदा की जानी चाहिए ।हमेशा यह लिखा जाता है कि कंगना रनौत के ट्वीट पर पाठक दो दलों में बटे हुए नजर आए ।अफसोस अगर पाठक वास्तव में इस भारतवर्ष से प्रेम करते हैं तो उन्हें कंगना रनौत जैसी थर्ड क्लास महिला के विचारों को नकार देना चाहिए। यह हिंदुस्तान ,यह अजीम भारत, यह विश्व गुरु का सपना देखने वाला भारत क्या कंगना रनौत के विचारों से अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर लेगा। फिर ऐसे लोगों के विचारों को महत्व क्यों दिया जा रहा है ।मेरा आप से यही प्रश्न है—? ऐसे लोगों का सामाजिक बायकाट होना वर्तमान में अति आवश्यक है ।वरना कल आपके पास सिर्फ पछतावा होगा।

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