या-रब न वो समझे हैं न समझेंगे मरी बात

या-रब न वो समझे हैं न समझेंगे मरी बात
डाक्टर सलीम खान
यौम जम्हूरिया की किसान परेड के खिलाफ बड़ी उम्मीदों से अमित शाह ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दी लेकिन उसे ये कह कर धुतकार दिया गया कि नजम व नस्क का मामला इंतिजामिया का है अदलिया का नहीं । उसके बावजूद न जाने क्यों 20 जनवरी की अगली तारीख रख दी गई। सुप्रीम कोर्ट का ये रवैया उसको शक व शुबा के दायरे में ले जाता है। इससे पहले सुप्रीमकोर्ट ने बड़े तुमतराक से किसानों का मसला समझने के लिए एक कमेटी तश्कील दी लेकिन अदमे ऐतिमाद के सबब किसानों ने उसे मुस्तरद कर दिया । क्यों कि जिन चार लोगों के नाम इस में शामिल किए गए उनको देखकर ये समझना मुश्किल है कि हुकूमत और अदालत की ये जोड़ी खुद बेवकूफ है या अवाम को बेवकूफ समझती है? ऐसा लगता है कि दोनों ही बातें सही हैं । फिलहाल न सिर्फ किसान बल्कि अवाम भी सरकार और अदालत का मंशा समझ चुके हैं इसलिए उनके झांसे में नहीं आते।
अदालत के इस मुतनाजे फैसले के बाद जब मारूफ किसान रहनुमा राकेश टिकैत से पूछा गया कि आखिर वो ये मुजाहरा कब तक जारी रखेंगे? तो उसके जवाब में टिकैत ने निहायत दिलचस्प जवाब दिया उन्होंने कहा कि जब हुकूमत साल चल सकती है तो तहरीक क्यों नहीं चल सकती? जब तक हुकूमत नए जरई कवानीन को वापस नहीं लेगी तब तक हमारा मुजाहरा जारी रहेगा उन्होंने ये भी कहा कि हम सुप्रीमकोर्ट के फैसले का एहतिराम करते हैं लेकिन कमेटी से खुश नहीं हैं।सवाल ये है कि आखिर किसान सुप्रीमकोर्ट की कमेटी से क्यों नाराज हैं ? उस के अंदर दो माहिरीन जराअत अशोक गुलाटी और प्रमोद जोशी हैं जबकि दो किसान रहनुमा अनिल घनोट और भूपिंदर सिंह मान हैं। बदकिस्मती से ये चारों जरई कानून के हामी हैं।
इंडियन कौंसल फौर रिसर्च आन इंटरनेशनल इकोनोमिक रिलेशन में प्रोफेसर की खिदमात अंजाम देने वाले अशोक गुलाटी को वजीरे आजम मोदी ने 2015 मैं पदमश्री के एजाज से नवाजा । उसके बाद वजीरे आजम के जरिये बनाई गई जराअती टास्क फोर्स के रुकन और जरई बाजार सुधार की खातिर बनाए गए माहिरीन पैनल के सद्र नशीन बनाए गए । इन एहसानात के बदले वो हर हफ्ता मजमून लिख कर सरकार की सफाई पेश करते रहते हैं। माहे सितंबर के अंदर ही वो इन कवानीन को किसानों के लिए फाइदामंद बता चुके हैं। उन्होंने सरकार को मश्वरा दिया था कि हिजबे इख्तिलाफ किसानों को भटका रहा है मगर हुकूमत को अपना काम जारी रखना चाहिए। अब गुलाटी साहिब तो गुलाटी खाकर किसानों की बात नहीं मान सकते इसलिए उनसे गुफ्त व शनीद का क्या मतलब!
डाक्टर प्रमोद जोशी भी सरकारी मुलाजिम हैं पहले नेशनल सेंटर फौर एग्रीकल्चरल इकोनोमिक्स ऐंड पालिसी रिसर्च के डायरेक्टर रह चुके हैं फिलहाल साउथ एशिया फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीटियूट के डायरेक्टर हैं और कई इज्जत से नवाजे जा चुके हैं। वो 2017 से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए राह हमवार कर रहे हैं और उसे किसानों के लिए फायदेमंद बता रहे हैं । उनके खयाल में इस से काशतकारी की लागत में कमी आती है। अब इतने बड़े माहिर की अक्ल में किसानों का मामूली मुतालिबा कैसे आ सकता है। इन दोनों माहिरीन के अलावा महाराष्ट्र में किसानों की एक बड़ी तंजीम शेतकरी संघटन के सद्र अनिल घनोट भी इस कमेटी में शामिल किए गए हैं। मारूफ किसान रहनुमा शरद जोशी की कियादत में किसानों ने पहली बार प्याज की कीमतों को लेकर पुणे और नासिक की सड़क को इसी तरह बंद किया था जैसे फिलहाल दिल्ली से बाहर जाने वाली सड़क बंद की गई है। दो साल पहले हुकूमत की खिलाफवरजी करते हुए घनोट ऐच टी बी-टी बीजों का इस्तेमाल करवा चुके हैं लेकिन अब उनका सुर बदला हुआ है। उनके खयाल में नए जरई कानीन से देहातों में कोल्ड स्टोरीज वगैरा बनाने से दौलत आएगी और अगर ये कवानीन वापस लिए गए तो किसानों के लिए खुले बाजार का रास्ता बंद होजाएगा। वो किसानों की तहरीक को सियासी और हिज्बे इख्तिलाफ का बहकावा कहते हैं।
इस कमेटी में पंजाब के किसान रहनुमा और अखिल भारतीय किसान समन्वय समिती के सद्र भूपिंदर सिंह मान को भी शामिल किया गया था। उन्होंने14 दिसंबर को वजीरे जराअत नरेंद्र सिंह तोमर को खत लिख कुछ एतिराजात तो किए लेकिन साथ ही ये भी लिखा कि हिन्दुस्तानी जराअती निजाम की नजात के लिए वजीरे आजम नरेंद्र मोदी की कियादत में जो तीन कवानीन मंजूर किए गए हैं वो उनके हक में सरकार की हिमायत के लिए आगे आए हैं। इस खत से हुकूमत को यी खुशफहमी हो गई कि मान की मदद से वो पंजाब के किसानों को मनाने में कामयाब हो जाएगी लेकिन खुद मान ही नहीं माने और उन्होंने सुप्रीमकोर्ट की तशकील शूदा कमेटी से अपने आपको अलग कर लिया । इस तरह सरकारी ट्रैक्टर का एक पहिया पहले ही मरहले में पंचर हो गया । अब ये कैसे आगे बढ़ेगा या खेत ही में पड़ा पड़ा सड़ जाएगा ये तो वक्त ही बताएगा।
सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में बेचारगी के आलम में ये भी कहा कि आप हम पर एतिमाद करें या ना करें लेकिन हम अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। यहां एक सवाल ये पैदा होता है कि आखिर ये सुप्रीम कोर्ट को ये कहने की जरूरत क्यों पेश आई? हकीकत ये है हुकूमत के साथ सांठगांठ करके अदालत ने अपना एंतिबार खो दिया है। कल तक मुस्लमान ये कहते थे कि हमें अदलिया पर मुकम्मल एतिमाद है इसलिए उनके पास बाबरी मस्जिद के हक में शवाहिद मौजूद थे। अदालत ने उनको तस्लीम किया और कहा कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़ कर नहीं बनाई गई थी। इस में मूर्तियां रखना कानून की खिलाफवरजी था और बाबरी मस्जिद को शहीद करना संगीन जुर्म था लेकिन इस के बावजूद आस्था की बुनियाद पर मस्जिद की जमीन मुजरिमीन के हवाले कर दी गई । ऐसे में अदलिया का ऐतिबार कैसे बाकी रह सकता है? अब अगर किसान ये कहते हैं कि उनकी आस्था है कि ये कवानीन नुक्सानदेह हैं तो अदालत को अपनी रिवायत का पास व लिहाज करते हुए इस को मान लेना चाहिए ।
अदालत ने इस मुतनाजे फैसले के बाद दो बार अपने वकार को नुक्सान पहुंचाया। लॉक डाउन के बाद मुहाजिर मजदूरों की बाबत सरकार ने कहा कोई भी सड़क पर मौजूद नहीं है । अदालत ने आखें मूंद कर सरकारी झूठ की ताईद कर दी, जबकि सारी दुनिया उसकी तरदीद कर रही थी । ऐसे में अदलिया के ऊपर से ऐतिमाद उठेगा नहीं तो क्या बहाल होगा? शाहीन बाग के बारे में कह दिया कि इंतिजामिया को अदालती फैसले का इंतिजार किए बगैर अजखुद मुजाहिरीन को हटा देना चाहिए लेकिन किसानों से सरकार डर गई और ऐसा नहीं कह सकी । इसलिए गब्बर का मुकालमा इस पर सादिक आ गया कि जो डर गया वो मर गया। वैसे अदालत तो दूर किसानों की इस तहरीक ने तो अपने आपको शक्तिमान समझने वाले अमित शाह को भी डरा दिया है। यही वजह है कि वजीरे दाखिला ने हरियाणा की बी जे पी सरकार को मश्वरा दिया है कि वो जरई कवानीन की हिमायत में तकरीबात के बचे। इस हिदायत की तस्दीक हरियाणा के वजीरे तालीम कंुवरपाल गुर्जर ने की और कहा कि वजीरे दाखिला ने अगली इत्तिला तक तकरीबात को रोकने का फरमान जारी कर दिया है। अब अगर बिलाव डर जाये तो रंगा के बारे में क्या कहा जा सकता है? क्योंकि दोनों एक जान दो कालिब हैं। किसानों के हवाले से तो फिलहाल मर्कजी हुकूमत गालिब के इस शेअर को वजीफा बनाए कि:
या-रब न वो समझे हैं न समझेंगे मरी बात
दे और दिल उनको जो न दे मुझको जुबां और

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