रेशमी रुमाल तहरीक के संचालक हज़रत शैख़ उल हिन्द मौलाना महमूद हसन देवबन्दी की रुख़्सती का सोवा साल(100)

रेशमी रुमाल तहरीक के संचालक हज़रत शैख़ उल हिन्द मौलाना महमूद हसन देवबन्दी की रुख़्सती का सोवा साल(100)

कमल देवबन्दी(लेखक,अध्यापक

घड़ी की धड़कती सुईं,कलेंडर के बदलते सफहात गुज़रते वक़्त का अहसास कराते हैं——इस क़दीम और तवील दुनिया मे करोड़ों लोग आए और रुख़सत हो गए।कुछ लोग अपने बेहतरीन अमल,इल्म,हुनर से इंसानी सीनो में महफूज़ हो गए और कुछ लोग अपने ख़राब अमल से इतिहास का सियाह बाब हो गए——–देवबन्द 1857 के बाद से अपने इल्म,अमल,फन,तहरीक और लाज़वाल लोगों के कारनामों की वजह से पूरी दुनिया की आंख का तारा बन गया।इसी वजह से साल 2020 का यह आख़री माह बड़ी अहमियत रखता है।
इस साल दारुल उलूम देवबंद के पहले शागिर्द,पूरी अंग्रेज़ी सरकार से लोहा लेने वाले,मायनाज़ उस्ताज़,वक्ता और रेशमी रुमाल तहरीक के संचालक हज़रत शैख़ उल हिन्द मौलाना महमूद हसन देवबन्दी की रुख़्सती का सोवा साल(100)है।जिन्होंने अंग्रेज़ी सरकार से लोहा लेने,इस मुल्क को आज़ाद कराने के लिए कई आंदोलन किए।ख़ुद काला पानी के नाम से प्रसिद्ध माल्टा की जेल में अपनी रूह और अपने बदन पर अंग्रेज़ी सरकार के ज़ुल्म सहे।मरते वक्त इस दुःख का इज़हार किया के मुझे अफसोस है के बिस्तर पर हूँ मेरी मौत अंग्रेजों के खिलाफ मैदान ए जंग में होनी चाहिए थी।उन्होंने दारुल उलूम में बैठकर ऐसे शागिर्दों की तरबियत की जो इस हिंदुस्तान को आज़ाद कराने में सहयोगी साबित हुए।सन 1851 को बरेली में जन्मे हज़रत शैख़ उल हिन्द का पूरा जीवन अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में गुज़रा साथ ही आपने सरंक्षक के रूप में दारुल उलूम की अमूल्य सेवा की।30 नवंबर 1920 को आपका देहली में इंतक़ाल हुआ।जनाज़ा देवबन्द लाया गया और क़ासमी कब्रस्तान में आपकी तदफीन हुई।आज 100 बरस बाद भी आप हर एक के दिल मे ज़िन्दा हैं और हर भारतीय आपका क़र्ज़दार है और रहेगा।कई वर्ष पहले केंद्र में कॉंग्रेस सरकार ने उनकी रेशमी रुमाल तहरीक पर डाक टिकट जारी कर उनकी अमूल्य खिदमात को स्वीकारा था।
इसी वर्ष देवबन्द के प्रसिद्ध शायर,लेखक,समीक्षक मौलाना आमिर उस्मानी के जन्म के भी 100 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं।आपका जन्म नवंबर 1920 को हुआ था।1960 से 1975 के बीच उर्दू पत्रकारिता और शायरी में आमिर उस्मानी ने खूब जलवे बिखेरे।उर्दू मासिक “तजल्ली”दुवारा उन्होंने उर्दू पत्रकारिता को नई पहचान दी।उनका क़लमी चरित्र”मुल्ला इबनुल अरब मक्की”ने “मस्जिद से मयखाने तक”के शीर्षक के ज़रिए उर्दू पढ़ने वाले तबके को दीवाना बनाए रखा।”यह क़दम क़दम बलाएँ”आपका मशहूर शेरी मजमुआ है।आप देवबन्द की उर्दू अदबी तारीख़ के रोशन बाब हैं।
🌹विश्वप्रसिद्ध आलिमे दीन, इमाम उल असर हज़रत अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी रह.साबिक़ शैख़ उल हदीस दारुल उलूम देवबंद के बड़े साहबज़ादे हाफिज़ सय्यद अज़हर शाह क़ैसर की पैदाइश का भी यह 100वां साल है।आप दिसंबर 1920 को मोहल्ला दीवान में पैदा हुए थे।14 वर्ष की अल्पआयु में आपने लिखना शुरू किया और जब 27 नवंबर 1985 को आप इस दारे फानी से रुख़सत हुए तो।हज़ारों मज़मून,तबसरे,तजज़िये मंज़रे आम पर आ चुके थे।आप 40 साल दारुल उलूम देवबंद की उर्दू मासिक पत्रिका के संपादक रहे।हयाते अनवर,यादगारे ज़माना हैं ये लोग,सफीना ए वतन के नाख़ुदा, मुताफररीक़ात,सीरत हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ रज़ि.उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं।80 के दशक में उर्दू मासिक”तय्यब”पाक्षिक उर्दू”इशाते हक़”का सफल प्रकाशन किया।आपने शायरी भी की और साथ हज़ारों लोगों को क़लम पकड़ना,लिखना सिखया।
आज यह तीन अज़ीम लोग हमारे बीच मौजूद नही हैं।मगर इनकी तेहरिकात, तहरीरें,इल्म,अमल हमेशा ज़िन्दा रहेगा।सही बात यह है कि हमे बड़ों को याद करने का सलीक़ा भी नही है।अल्लाह इनकी क़ब्रों को नूर से भर दे।इनके दरजात बुलन्द करे।
कमल देवबन्दी(लेखक,अध्यापक

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