छुआछूत और ज़ातीवाद-

छुआछूत और ज़ातीवाद-

फ़ेमस और सफ़ल होने से भी फ़र्क़ नहीं पड़ता:नवाज़ुद्दीन

*(शिब्ली रामपुरी)*
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और यह बेहद गर्व की बात है लेकिन क्या हम इस सच्चाई को झुठला सकते हैं कि सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में आजादी के इतने वर्षों बाद भी छुआछूत किसी ना किसी तरह से कायम है और इसी छुआछूत की वजह से राजनीति से लेकर कई तरह से भेदभाव होता है. नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी को तो आप जानते ही होंगे.बड़े एक्टर हैं.एक इंटरव्यू दिया है जिसमें नवाज़ कहते हैं मेरी दादी छोटी जाति से ताल्लुक़ रखती थीं आज भी मेरी दादी की वजह से उन्होंने हमें एक्सेप्ट नहीं किया है. नवाजुद्दीन कहते हैं मैं फेमस हूं कामयाब हूं इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. उनके भीतर यह गहराई तक बसा हुआ है उनके रगों में है वह इसे अपना गौरव मानते हैं.हाथरस मामले को ही ले लीजिए जो मामला सुर्खियों में है इसमें मीडिया की एक टीम हाथरस के उस गांव में पहुंची जहां पर उस लड़की के साथ यह सब अमानवीय कृत्य हुआ था. वहां पर जाने के बाद मीडिया ने जो कुछ दिखाया उसके मुताबिक तो वहां के कई लोगों का यह कहना था कि इस गांव में छुआछूत है और उनको इसी के चलते भेदभाव का सामना करने को मजबूर होना पड़ता है. यह सिर्फ किसी एक जगह की बात नहीं है बल्कि देश में अनेकों जगह ऐसी हैं कि जहां पर छुआछूत से होते भेदभाव की घटनाएं हमारे सामने आ चुकी हैं. कहीं किसी युवक को दूल्हा बनने पर इसलिए मारा पीटा जाता है कि वह छोटे तबके से ताल्लुक रखता है तो कहीं किसी को कुर्सी पर बैठने की वजह से बदसलूकी का शिकार होना पड़ता है. कितने अफसोस की बात है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम उस समस्या से निकल नहीं सके हैं कि जिससे हमें देश आजाद होते ही निकल जाना चाहिए था.वह छुआछूत जो आज न जाने कितने योग्य युवाओं का भविष्य अंधकार की ओर धकेलने में अहम किरदार अदा कर रही है. कुछ वक्त पहले अनुभव सिन्हा ने एक फिल्म बनाई थी जिसका नाम आर्टिकल 15 था.यह फिल्म आर्टिकल 15 द्वारा दिए गए हर एक देशवासी के अधिकारों पर बनी थी. फिल्म भारत के संविधान में मूल अधिकार के रूप में वर्णित आर्टिकल 15 के विषय को छूती है. फिल्म में साफ़ दिखाया गया था कि किस तरह से संविधान में समान अधिकार होने के बावजूद कुछ लोगों के दिमाग इस कदर खराब होते हैं कि वह छुआछूत रखते हैं और उसके कारण न जाने कितने लोगों को भारी परेशानियों के दौर से गुजरते हुए अपना जीवन यापन करने को मजबूर होना पड़ता है. फिल्म में एक डायलॉग था जिसके मुताबिक तीन लड़कियां अपनी दिहाड़ी में सिर्फ तीन रूपये अधिक मांग रही थी. जिसकी वजह से उनका रेप हो गया. इस फिल्म में समाज के सबसे निचले पायदान पर माने जाने वाले लोगों की दर्दनाक और अफ़सोसनाक दुर्दशा की कहानी को काफी प्रमुखता से दिखाया गया था कि उनके साथ किस तरह से जुल्म और अत्याचार होते हैं. यह तो एक फिल्म थी जो सिर्फ मात्र कुछ कहानी पर आधारित थी लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में न जाने कितनी तरह से छुआछूत जिंदा है और छुआछूत के कारण भेदभाव के कारण लोगों को परेशानियों का सामना करने को मजबूर होना पड़ता है. इसी छुआछूत की वजह से न जाने कितने लोग तरक्की नहीं कर पाते हैं और उनका जीवन नर्क के समान ही बना रहता है. खुद को ऊंचा समझने वाले कुछ लोग इन निचले पायदान पर जिंदगी गुजारने वाले लोगों को इंसान नहीं समझते और उन पर अत्याचार करते हैं. हाथरस में मीडिया की टीम जब पहुंची और उसने वहां के कुछ लोगों से सवाल किए तो उन लोगों की बातों से उनका दर्द साफ़ छलका कि किस तरह से समाज के निचले पायदान पर उनको माना जाता है. संविधान ने सभी को समान अधिकार दिए हैं और आर्टिकल 15 इस बात को वर्णित करता है कि किसी के साथ भी भेदभाव नहीं होना चाहिए मगर अफसोस कुछ लोग आज भी अपने दिमाग में गलत तरह के विचार रखते हैं और इसी मानसिकता की वजह से वह दूसरे को बेहद कमजोर समझते हैं और मौका मिलने पर वह किसी भी तरह के अत्याचार करने से पीछे नहीं रहते हैं. यह बात भी आईने की तरह साफ है कि ज्यादातर मामलों में अत्याचार निचले तबके पर जिंदगी जीने वाले लोगों के साथ ही होता है. इस बारे में सबको गंभीरता से सोचने की जरूरत है और खास तौर पर सरकारों को इस ओर गंभीरता से ध्यान देकर ठोस कदम उठाने की जरूरत है.

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