सुशांत सिंह: शुद्ध देशी आत्महत्या या डिटेक्टिव ब्योमुकेश बख़्शी

सुशांत सिंह: शुद्ध देशी आत्महत्या या डिटेक्टिव ब्योमुकेश बख़्शी
डाक्टर सलीम खान
जवाँ-साल सुशांत सिंह राजपूत की मौत अफसोसनाक है । उसके वालिद के के सिंह को कत्ल का शक वाजिब है। उसकी माशूका रिया चक्रवर्ती पर दौलत हड़पने का इल्जाम सच हो सकता है। किसी ने अगर सुशांत को आत्महत्या के लिए वाकई मजबूर किया हो तो उसे सजा मिलनी चाहिए। उसका अगर कत्ल हुआ है तो कातिल को गिरफ्तार करके कैफरे किरदार तक पहुंचाया जाना चाहिए नीज अगर कोई माली तनाजा है तो उसका हल भी निकलना चाहिए। लेकिन क्या ये कोई कौमी या रियासती मसला है कि इस पर आसमान सर पर उठा लिया जाए ? नहीं ये एक ऐसा गुबार है कि जिसकी आड़ में अहम मामलात की पर्दापोशी की जा रही है। कौमी सतह पर सुशांत राजपूत और प्रशांत भूषण का मामला बयकवक्त सुप्रीम कोर्ट में गया। इस से ऐसा लगा कि गोया प्रशांत भूषण के मुकद्दमा में सुप्रीम कोर्ट ने जो मनफी रवैय्या इख्तियार कर रखा है उसकी जानिब से तवज्जा हटाने के लिए सुशांत का मामला वहां ले जाया गया । उसे महाराष्ट्र और बिहार की महा भारत बना कर पेश किया गया जिसमें एक को सुशांत का दुश्मन दुर्योधन और दूसरे को मसीहा अर्जुन बना दिया गया । इस लिए सुशांत सिंह राजपूत के तिब्बी पोस्टमार्टम के साथ उस आत्महत्या का सियासी पोस्टमार्टम जरूरी है ।
सुप्रीमकोर्ट के जरिया सी बी आई की जांच को इन्साफ की बहुत बड़ी जीत करार दिया गया हालाँकि तफतीश कोई भी सरकारी एजेंसी करे उससे हकीकत नहीं बदलती। नीज सी बी आई भी दूध का धुला इदारा नहीं है। उसके आफसरान पर भी बदउनवानी के संगीन इल्जामात लग चुके हैं। सच्च तो ये है कि प्रशांत भूषण को नजरअंदाज करने की खातिर ही सुशांत सिंह राजपूत के गुब्बारे में मुसलसल हवा भर कर उसे फुलाया जाता रहा। इसलिए ये कहना पड़ता है कि सुशांत तो बहाना है प्रशांत ही निशाना है। सुशांत की आत्महत्या को मीडीया ने इस तरह उछाला कि जैसे मुल्क में आत्महत्या की ये वाहिद वारदात है। जन्नत निशॉँ हिन्दुस्तान का कोई बाशिंदा आत्महत्या करता ही नहीं है। हालाँकि जराइम के आंकड़े वाला इदारा एन सी आर बी के मुताबिक मोदी सरकार के बाद 2014 में आत्महत्या करने वाले 1,31,666 थे। इस के बाद 2015 के अंदर उसमें इजाफा हुआ और ये वारदातें 1,33,623 हो गईं। 2016 और 2017 में कुछ कमी हुई, लेकिन 2018 में ये फिर से बढ़कर 1,34,516 पर पहुंच गई। मोदी हुकूमत में उन शोबों की रिपोर्ट रोक दी जाती है, जहां से बुरी खबर आती हो। एन सी आर बी भी 2019 का जायजा अभी तक नहीं आया तो गुमान गालिब है बेहतरी नहीं आई होगी। अगर कोई ये कहे कि आम लोगों की खबर नहीं बनती बल्कि मारूफ फिल्मी हस्तियों या सियासतदानों की बनती है तो वो भी सही है लेकिन तब भी तफरीक व इम्तियाज तो है, क्योंकि सुशांत को दूसरों से ज्यादा अहमियत दी गई।
1964 मैं मशहूर अदाकार और फिल्मसाज गुरूदत्त के बाद 1996 मैं सिल्क स्मिता तक किसी फिल्मी शख्सियत की आत्महत्या अखबारात की जीनत नहीं बनी लेकिन फिर इस रुझान में बतदरीज इजाफा होता चला गया। 2002 में मोना नवल नाम की अदाकारा ने आत्महत्या की उसके बाद 2005 में म्यूरी का मामला सामने आया। 2008 में कुनाल सिंह और 2010 मैं संतोष जोगी ने खुद को हलाक किया। 2013 में जिया खान और 2015 में उदय करण के अलावा शिखा जोशी ने भी आत्महत्या कर ली । 2016 में भी दो लोगों साई प्रशांत और प्रत्याशा बनर्जी ने अपनी जान ली । 2017 में नितिन कपूर और 2019 मैं किशिक पंजाबी ने आत्महत्या की। 2020 में ये मामला और काफी संगीन हो गया। सुशांत से पहले परीक्षा महित फांसी के फंदे पर लटक गई। सुशांत के बाद टेलीविजन के अदाकार समर्क शर्मा और सुशील गूदा ने खुद को हलाक किया । इसलिए ये कोई ऐसी अनोखी बात नहीं है कि जिस पर रोज मीडिया में बहस व मुबाहिसा हो।
अभी हाल में सुशांत की मानिंद बिहार ही की रहने वाली अनूपमा पाठक ने भी आत्महत्या की। मीडीया ने चूँकि पाठक को नजरअंदाज कर दिया इसलिए बिहार के वजीरे आला नीतीश कुमार को भी पाठक से कोई हमदर्दी नहीं हुई । उसी बीच चेन्नई की अदाकारा जया लक्ष्मी ने तामिल नाडू के मकामी सियासतदानों की जानिब से हरासाँ किए जाने पर आत्महत्या की कोशिश की ताहम बरवक्त कार्रवाई करके उनकी जिंदगी बिचा ली गई । जया लक्ष्मी चूँकि जिन्दा है इसलिए उनसे तफतीश करके उन्हें मजबूर करने वालों को बेनकाब करना निहायत आसान और सजा देना जरूरी है लेकिन चूँकि वो बारसूख लोग हैं इसलिए गालिबन मीडीया को खरीद कर उस का गला घोंट दिया। हैरत की बात ये है कि इन लोगों का नाम तक मीडिया से पोशीदा रहा । वैसे तो ये अच्छी बात है कि जब तक कोई मुजरिम करार ना दिया जाये उसका नाम ना आए लेकिन आम लोगों का तो बगैर सबूत के ही मीडीया ट्रायल कर दिया जाता है। उनपर संगीन इल्जामात की बौछार की जाती है लेकिन बड़े सियासतदानों के मामले में तहजीब व अखलाक सब याद आ जाता है। यही वजह है कि सुशांत के मामले में दिन रात आँसू बहाने वाले मीडिया को जया लक्ष्मी से कोई हमदर्दी नहीं है और ना वो उसे हरासाँ करने वालों को सजा दिलवाना चाहता है।
आजकल मीडीया सरकार से ज्यादा देशभक्ति का ढोंग रचाता है लेकिन उसके नजदीक फौजियों की आत्महत्या भी किसी खास अहमियत की हामिल नहीं है। इस साल जब यौमे आजादी से एक दिन पहले राष्ट्रपति कौम से खिताब फरमाने वाले थे जिला बडगाम के इलाके में एक फौजी अहलकार ने मुबय्यना तौर पर आत्महत्या कर ली। राम नाथ कोविंद ने राम मंदिर की तामीर पर खुशी का इजहार तो किया मगर अपने फौजी की ताजियत में दो अलफाज नहीं कहे। मीडिया ने तो उसकी खबर ही नहीं ली क्योंकि सुशांत के मातम में मसरूफ था। अर्नब गोस्वामी तो महलूक फौजी लाॅंस नायक ओम प्रकाश का नाम भी नहीं जानता होगा क्योंकि उसके नाम का जाप करने के ना पैसे मिलते हैं और न टी आर पी बढ़ती है। इस साल 21 मार्च को भी श्रीनगर के सिवल सेक्रेटरिएट पर मामूर सी आर पी एफ के हैडकांस्टेबल दिलबाग सिंह ने आत्महत्या की थी लेकिन किसी ने उनपर ना इलतिफात की निगाह डाली और न उनके घरवालों की खबरगीरी की।
कौमी सहाफत के संजीदा लोगों ने इस का नोटिस लिया । कश्मीर के हालात पर गहरी नजर रखने वाले मुबस्सिरीन ने कहा कि सिक्योरिटी फोर्सिज के अहलकारों बिलखसूस सी आर पी एफ जवानों में आत्महत्या के बढ़ते हुए रुझान की वजह सख्त डयूटी, अपने अजीज व अकारिब से दूरी और घरेलू व जाती परेशानियाँ हैं। योगा और दीगर नफसियाती मश्कों के बावजूद कश्मीर में जवानों के अंदर आत्महत्या के वाकियात घटने की बजाय बढ़ रहे हैं। सरकारी आदाद व शुमार के मुताबिक साल 2010 से 2019 तक मुल्क में 1113 फौजी अहलकारों की आत्महत्या के मुश्तबा वाकियात दर्ज किए गए। ये कोई मामूली तादाद नहीं है लेकिन हमारे मीडिया और सियासतदानों के नजदीक गैर अहम है । इस तनाजुर में पिछले साल कश्मीर के अंदर तैनात किए जानेवाले दस हजार सी आर पी एफ के जवानों की वापसी का फैसला खुश आइंद है । इस में कश्मीरी अवाम और उन फौजियों दोनों की भलाई है।
सुशांत सिंह का मामला बुनियादी तौर पर उसकी माशूका रिया चक्रवर्ती और वालिद के के सिंह के बीच जायदाद का तनाजा है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से सी बी आई जांच का फैसला सुनाए जाने के बाद के के सिंह ने खुद को इमलाक का कानूनी वारिस बताते हुए सुशांत के जरिया मुकर्रर शूदा वकीलों, सीएज और प्रोफेशनल्ज की खिदमात मंसूख कर दीं। उन्हों ने कहा कि अब उनकी इजाजत के बगैर किसी वकील या सी ए को सुशांत के मामला में पेश होने का हक नहीं है। वो और उनकी बेटियों ने वकील वरूण सिंह या वकील विकास सिंह ही को अपने खानदान की पैरवी का जिम्मेदार बनाया है। के के सिंह को इस वजाहत की जरूरत इसलिए पेश आई कि एक मारूफ चार्टर्ड अकाउंट कंपनी ने सुशांत के खातों की फौरेंसिक जांच करके ये रिपोर्ट दे दी है कि उसके बैंक से रिया चक्रवर्ती के खाते में कोई रकम मुंतकिल नहीं हुई। इस तरह गोया सारे इल्जामात की हवा निकल गई उस के बावजूद एक विरासत की लड़ाई को सियासी फायदा उठाने के लिए कौमी मसला बना दिया गया । उस की आड़ में कोरोना तकरीबन 70 हजार रोजाना के मरीजों को छुपा दिया गया और लग भग दो करोड़ मुलाजिमत पेशा लोगों की बेरोजगारी से तवज्जा हटा दी गई । वैसे बेशुमार रोजाना कुँआं खोद कर पानी पीने वालों की जानिब तो कभी कोई देखता ही नहीं ।

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