अयोध्या मामले में फैसला देने वाले पूर्व CJI रंजन गोगोई राज्यसभा के लिए नामित, असम NRC की भी की थी निगरानी

देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई अब राज्यसभा के सदस्य होंगे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें संसद के उच्च सदन के लिए नामित किया है। रंजन गोगोई ने यूं तो कई अहम फैसले दिए, लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण अयोध्या मामले का फैसला था।

अयोध्या मामला, असम में एनआरसी और सीजेआई को आरटीआई के दायरे में रखने जैसे फैसले सुनाने वाले देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई अब सांसद बन जाएंगे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमवार शाम उन्हें राज्यसभा के सदस्य के रूप में नामित किया। रंजन गोगोई पिछले साल 17 नवंबर को रिटायर हुए थे। रिटायरमेंट से ठीक पहले उन्होंने अयोध्या मामले का ऐतिहासिक फैसला सुनाया था और बाबरी मस्जिद गिराए जाने को अपराध मानते हुए और यह मानते हुए कि मस्जिद को किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाया गया था, रंजन गोगोई ने अयोध्या की सारी जमीन मंदिर के नाम करने का फैसला दिया था। अयोध्या मामले को उनके सबसे बड़े फैसलों में गिना जाता है।

दरअसल अयोध्या विवाद ऐसा मामला था जो सुप्रीम कोर्ट अस्तित्व में आने से भी पहले से अदालत में था। रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट की उस संविधान पीठ के अध्यक्ष थे जिसने अयोध्या मामले की सुनवाई की थी। करीब 40 दिन की लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था।

जस्टिस रंजन गोगोई को एक सख्त और कभी-कभी सबको हैरान कर देने वाले जज के रूप में जाना जाता है। अयोध्या मामले के दौरान भी उन्होंने कई बार सभी पक्षों की दलीलों को लंबा खिंचते देख टोका था। इतना ही नहीं उन्होंने इस मामले की सुनवाई तय तारीख 18 अक्टूबर से दो दिन पहले ही यानी 16 अक्टूबर को पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इसके बाद माना जा रहा था कि अपने रिटायरमेंट से एक-दो दिन पहले जस्टिस रंजन गोगोई अयोध्या मामले का फैसला सुनाएंगे, लेकिन उन्होंने सबको चकित करते हुए अचानक 8 नवंबर की रात ऐलान कर दिया कि अयोध्या मामले का फैसला 9 नवंबर को सुनाया जाएगा।

इसके अलावा जस्टिस गोगोई के नेतृत्व में ही सुप्रीम कोर्ट ने असम में एनआरसी प्रक्रिया की निगरानी की और इसके लिए समयसीमा तय की। असम एनारसी को लेकर कई तरह के विवाद सामने आए लेकिन रंजन गोगोई ने अपना सख्त रुख कायम रखा।

रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ही दिल्ली हाईकोर्ट के 2010 के उस फैसले को मान्यता दी जिसमें मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में आता है।

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