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निर्भया कांड: मृत्यु दंड से क्या होगा हासिल ?

फांसी टालने के लिए लगातार दया याचिकाएँ दायर करने वाले इन चारों के डेथ वारंट अब तक कम से कम तीन बार टाले जा चुके हैं. इसी हफ़्ते मुकेश सिंह की ओर से दिल्ली की एक अदालत में लगाई गई एक आख़िरी याचिका के ख़ारिज होने के साथ अब दोषियों के सामने फांसी टालने के सारे क़ानूनी उपाय लगभग समाप्त हो चुके हैं.

20 मार्च की सुबह साढ़े पांच बजे तय की गई इस फांसी की सज़ा के साथ ही दिसम्बर 2012 की सर्दियों में पूरे भारत को झकझोर देने वाला निर्भया कांड आख़िरकार अंत की ओर बढ़ जाएगा. लेकिन हर पंद्रह मिनट में बलात्कार का एक मामला दर्ज करने वाले इस देश के सामने महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रही यौन हिंसा से जुड़े बड़े सवाल अब भी पहाड़ की तरह खड़े हैं.

इस बीच यह सवाल उठना भी लाज़मी है कि भारत के तमाम महानगरों के युवाओं को सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करने वाला यह मामला, आख़िर देश में महिला सुरक्षा के विमर्श को कितना आगे ले गया? महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रहे यौन अपराधों का अध्ययन कर नई नीतियों पर सुझाव देने के लिए 2013 में गठित की गई जस्टिस वर्मा कमेटी रिपोर्ट की सिफ़ारिशें आख़िर कितनी कारगर रहीं? और अंत में यह सवाल भी कि निर्भया कांड के दोषियों को फांसी देने के बाद देश को महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रहे अपराध कितना कम हो जाने की उम्मीद है?

रंजना के तर्क को एक कदम आगे बढ़ाते हुए महिला अधिकार कार्यकर्ता और वरिष्ठ वकील फ़्लेविया एग्निस कहती हैं, “मृत्यु दंड से अपराध कम होते हैं, यह बात साबित करने के लिए कोई निर्णायक शोध या सबूत हमारे पास नहीं है. बल्कि सरकारी आँकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ी ही है, इसलिए मैं इस मृत्यु दंड का समर्थन नहीं करती हूँ”.

‘विक्टिम सपोर्ट प्रोग्राम’ या पीड़िता के मदद के लिए चलाई जा रही सरकारी सुविधाओं को नाकाफ़ी बताते हुए वह जोड़ती हैं, “हमारी न्याय व्यवस्था का पूरा ध्यान अपराधी को सज़ा दिलाने में लगा रहता है. ऐसे में पीड़िता को क़ानूनी, जेहनी और सामाजिक समर्थन दिलाने और उनके पुनर्वास का पूरा सवाल हमारे विमर्श से ग़ायब हो जाता है”.

बलात्कार के मामलों में भारत के मात्र 27 प्रतिशत वाले निराशाजनक सज़ा दर का हवाला देते हुए एग्निस बताती हैं, “दूसरे देशों में सुनवाई के वक़्त भी पीड़िता को क़ानूनी और मानसिक परामर्श के तौर पर काफ़ी सरकारी मदद मिलती है. लेकिन हिंदुस्तान में हम एफआइआर दर्ज होने के वक़्त ही पीड़िता को अकेला छोड़ देते हैं. ज़्यादातर वकील सिर्फ़ सुनवाई के एक दिन पहले पीड़िता को सूचित करते हैं कि कल उन्हें अदालत में पेश होना है. अचानक इस तरह अदालत में खड़ी पीड़िता कई बार क्रॉस एग्जामिनेशन का सामना नहीं कर पातीं क्योंकि उनकी कई बार सुनवाई से पहले उनकी मूलभूत क़ानूनी और मानसिक तैयारी भी नहीं होती. ऊपर से अदालत में वह पूरा ट्रॉमा दोबारा जीना होता है ..इस मुश्किल प्रक्रिया के दौरान बिना किसी मदद के अकेली जूझती पीड़िताएं कई बार टूट जाती हैं. बलात्कार के मामलों में सज़ा दर कम होने के पीछे यह एक महत्वपूर्ण कारण है लेकिन मृत्यु दंड की माँग के पूरे विमर्श में ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे खो जाते हैं. लेकिन जब तक हम इन मुद्दों पर ध्यान नहीं देंगे तब तक दीर्घकालिक परिवर्तन नहीं आएंगे”.

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