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गोगोई की हाँ में क्या न्यायपालिका पर सवाल छिपा है- नज़रिया

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जब भारत के पूर्व चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए मनोनीत किया तो इस पर किसी को कोई बहुत अचरज नहीं हुआ. आम तौर पर इस तरह के फ़ैसले पर लोगों की भौंहे तन जाती है क्योंकि जजों से कुछ अलिखित सिद्धांतों के पालन की उम्मीद की जाती है.

पूर्व चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई अपने कार्यकाल के आख़िरी दौर में कुछ ऐसे फ़ैसलों में शामिल रहे हैं जो सरकार चाहती थी.

वो उस बेंच की अध्यक्षता कर रहे थे जिसने अयोध्या के विवादित भूमि जैसे संवेदनशील मुद्दों पर फ़ैसला दिया था. बेंच ने विवादित ज़मीन जिस पर कभी बाबरी मस्जिद हुआ करती थी, उसे हिंदू पक्ष को राम मंदिर बनाने के लिए देने के फ़ैसला सुनाया था. यह एक ऐसा वादा था जो बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में लिखा था.

ये मामला भी पुराना था. सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े दक्षिणपंथी समूह 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिराने के बाद से ही वहां मंदिर बनाने की बात करने लगे थे.

ऐसा ही एक मामला रफ़ाल सौदे का भी था जिसमें कोर्ट ने ज़्यादा कीमत पर रफ़ाल सौदे के आरोप की जांच को ज़रूरी नहीं बताया था. इससे कई सवाल जिनके जवाब मिलने थे, वो नहीं मिले.

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