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नागरिकता संशोधन विधेयक भी कहीं संसदीय ‘जुमला’ तो नहीं ?

नागरिकता संशोधन विधेयक भी कहीं संसदीय ‘जुमला’ तो नहीं ?
डाॅ॰ सलीम ख़ान
तीन पड़ोसी देशों में रहने वाले ग़ैर-मुस्लिमों को उत्पीड़न से बचाने वेफ लिए व़फानून में संशोधन किया जा रहा है। इसलिए वहां अल्पसंख्यकों की स्थिति का वास्तविक आकलन करना महत्वपूर्ण मालूम होता है। इन देशों में सबसे ऊपर पाकिस्तान है। पाकिस्तान में, अल्पसंख्यकों की संख्या वुफल आबादी वेफ दो प्रतिशत से कम है। 40 लाख हिंदू और 32 लाख ईसाई हैं। पाकिस्तान में रहने वाले सिखों की कोई शिकायत कभी सार्वजनिक नहीं की गई। हाल ही में, पाकिस्तान की सरकार ने करतारपुर रोड को खोलकर भारत में न वेफवल सिख समुदाय को, बल्कि दुनिया भर वेफ सिखों को प्रसन्न कर दिया है। पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं वेफ ख़िलाप़फ विभाजन वेफ बाद, नेली, गुजरात या दिल्ली जैसे बड़े सांप्रदायिक दंगे नहीं झेलने पड़े।
हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता पाकिस्तान वेफ भीतर न पनपने वेफ कई कारण हैं, उनमें से एक तो अल्पसंख्यकों की बहुत छोटी संख्या है। दूसरे मुसलमानों का स्वभाव अपने से अध्कि शक्तिशाली वेफ साथ लोहा लेने का है, कमज़ोरों से टकराने का नहीं। इस्लाम की शिक्षाएं उन्हें दमन करने से रोकती हैं। राजनैतिक दलों वेफ लिए अल्पसंख्यकों वेफ ख़िलाप़फ नप़फरत पैफलाकर वोट प्राप्त करने की संभावनाएं नहीं हैं। छोटी संख्या वेफ कारण, कोई भी अल्पसंख्यकों वेफ तुष्टीकरण ;।चचमंेमउमदजद्ध की कोशिश भी नहीं करता, इसलएि वे शांतिपूर्ण जीवन जी रहे हैं। पाकिस्तान की सरकार अल्पसंख्यकों वेफ साथ वैफसा बर्ताव करती है इसका एक उदाहरण शहीद गंज मस्जिद और गुरुद्वारा वेफ मामले में सामने आ चुका है। इसका बाबरी मस्जिद की तरह राजनीतीकरण नहीं किया गया और गुरुद्वारे वेफ पक्ष में पै़फसला दिया गया। बाबरी मस्जिद की शहादत वेफ बाद, उपद्रवियों द्वारा क्षतिग्रस्त किए गए मंदिरों की मरम्मत सार्वजनिक ख़र्च पर की गई थी। सभी राजनैतिक और धार्मिक दलों ने मंदिरों वेफ विध्वंस की निंदा की थी।
पुलवामा वेफ बाद तनावपूर्ण माहौल में, पाकिस्तान वेफ पंजाब प्रांत में मंत्राी प़ैफयाज़्ाुल हसन चैहान ने हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाला बयान दिया। इसपर सोशल मीडिया पर उनवेफ विरु( अप्रसन्नता व्यक्त की गयी तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका सम्बोध्न आम हिंदुओं वेफ प्रति नहीं, बल्कि प्रधानमंत्राी मोदी और भारतीय सेना वेफ प्रति था। यह कहते हुए कि उन्होंने खेद भी प्रकट किया, इसवेफ बावजूद उन्हें मंत्रालय से निकाल दिया गया, जबकि भारत में ऐसा कोई दिन नहीं है जब मुसलमानों सहित विभिन्न वर्गों वेफ लोगों को अपमानित न किया जाता हो लेकिन ऐसा करनेवालों को प्रोत्साहन दिया जाता है। इस स्थिति में, किसी भी हिंदू, ईसाई या पारसी वेफ लिए पाकिस्तान से भारत आकर नागरिकता प्राप्त करने की संभाव लेशमात्रा भी नहीं है।
भारत में महिलाओं वेफ साथ होने वाली भयावह घटनाओं वेफ बारे में पढ़ने वेफ बाद कौन सा हिंदू अपने परिवार वेफ साथ यहां आने की ग़लती करेगा? पश्चिम की आलोचना वेफ डर से, मोदी सरकार ने ईसाइयों को यह सुविधा प्रदान की है कि वे भारतीय नागरिकता ले सकते हैं, लेकिन क्या पाकिस्तान में रहने वाले ईसाइयों को नहीं पता है कि लिंचिंग का शिकार होने वालों में उनकी संख्या आबादी वेफ अनुपात में मुसलमानों से अध्कि है? उनवेफ चर्चों पर लगातार हमले हो रहे हैं। उन्हें धर्म का प्रचार करने से रोका जाता है। उड़ीसा में ईसाई उपदेशक ग्राहम स्टेंस को उसवेफ अबोध् बच्चों वेफ साथ ज़िन्दा जलाने की प्रेरणा देनेवाले प्रताप सारंगी वेफ सम्मान वेफ लिए प्रधान मंत्राी मोदी ने उसे वेफंद्रीय मंत्राी बनाया है। पाकिस्तान में, मुहम्मद ;सल्ल॰द्ध की अवमानना करनेवाली अभियुक्त आसिया बीबी को अप़फज़ल गुरु की तरह सामूहिक विवेक को सन्तुष्ट करने का बहाना बनाकर दंडित करने वेफ बजाय अदालत द्वारा बरी कर दिया गया। जबकि भारत में मुसलमानों की तरह ईसाइयों को भी ‘घर वापसी’ वेफ लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे में कौन पागल ईसाई भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की कोशिश करेगा?
इस बिल में मुस्लिमों को नागरिकता नहीं देने की बात की गई थी, लेकिन पिफर भी अगर मोदी सरकार आम पाकिस्तानी मुसलमानों वेफ लिए लाल व़फालीन बिछाकर भी नागरिकता देने का प़ैफसला करे, तब भी शायद ही कोई स्वाभमिानी पाकिस्तानी मुस्लिम उसे लेने वेफ बारे में सोचेगा। इस प्रतिबंध का उद्देश्य हिंदू चरमपंथियों को मूर्ख बनाना है। वैसे अदनान सामी जैसे मुसलमान अपने व्यवसाय को चमकाने वेफ लिए यहां आते हैं और आडवाणी जैसे लोग बिना किसी संविधान संशोधन वेफ उन्हें नागरिकता देने की सलाह देते हैं। अप़फग़ानिस्तान में करज़ई और अशरप़फ ग़नी सरकार वेफ साथ भारत सरकार का घनिष्ठ संबंध है। यह ध्यान देने योग्य है कि वर्षों से जारी गृहयु( में कभी सांप्रदायिक रंग नहीं आया है। बामियान में बौ( प्रतिमा एक पर्यटक वेफंद्र थी जहां गौतम बु( की पूजा नहीं की जाती थी और उन्हें धार्मिक आधार पर नहीं गिराया गया था। हिंदू मंदिर अब भी काबुल में मौजूद हैं और उन्हें कभी नुव़फसान नहीं पहंुचाया गया। अप़फग़ान मुजाहिदीन विदेशी आक्रमणकारियों और उनवेफ सहयोगियों से लड़ते रहे हैं। वे धर्म वेफ आधार पर अतिक्रमणकारियों और सहयोगियों में भेदभाव नहीं करते।
बांग्लादेश में हिंदू आबादी 8 से 10 प्रतिशत है। उस समय से, लोग पश्चिम बंगाल या पूर्वोत्तर भारत चले गए। हिंदू मुस्लिम सभी उनवेफ बीच थे और यह सांप्रदायिक भेदभाव वेफ कारण नहीं, बल्कि आर्थिक समृ(ि वेफ कारण था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अगर असम और उसवेफ आसपास वेफ इलाव़फों में चाय वेफ बागानों और अन्य कामों वेफ लिए मज़दूरों की ज़रूरत होती थी, तो उन्हें विशेषाधिकार वेफ साथ बंगाल में लाया और बसाया जाता था। यह तब तक जारी रहा जब तक बांग्लादेश की तुलना में भारत समृ( नहीं हो गया था कि सीमा पार से लोग आजीविका वेफ लिए आते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। वर्तमान में बांग्लादेश की जी॰डी॰पी॰ भारत की तुलना में बेहतर है और समृ(ि मातृभूमि की तुलना में अधिक है, यही वजह है कि बांग्लादेशी राजदूत ने एक बयान में कहा कि हमारे लोगों को पलायन करना होगा तो ब्रिटेन, इटली और संयुक्त राज्य अमेरिका जाएंगे, यहां क्यों आएंगे?
भारत की तुलना में बेहतर आर्थिक अवसर और शांति पि़फलहाल मध्य-पूर्व में है। वहां, शंभूलाल किसी मुहम्मद अप़फज़ाज़ल जैसे बंगाली को ज़िन्दा जलाकर उसकी वीडियो बनाकर नहीं पैफलाता। बांग्लादेश द्वारा जारी नवीनतम जनगणना आंकड़ों वेफ अनुसार, हिंदुओं की आबादी आठ से दस प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसका कारण उलटा प्रवास है। जो लोग यहां आते थे, वे अब लौट रहे हैं। ऐसे में लोगों वेफ बांग्लादेश से भारत आने की संभावना कम है। भारत वेफ अंदर अल्पसंख्यकों वेफ अलावा, दलितों वेफ साथ जो व्यवहार होता है वह भी बाहर से आने वालों वेफ सामने रहेगा और वे विचार करेंगे कि अगर उनवेफ साथ ऐसा ही हुआ तो उनका क्या होगा। वैसे, इस संशोधन का हाल भी पंद्रह लाख रुपये की तरह होने जा रहा है। चार साल बाद जब अमित शाह से पूछा जाएगा कि पड़ोसी देशों वेफ कितने गै़र-मुस्लिमों को इसका लाभ मिला है, तो वे कहेंगे कि यह एक संसदीय ‘जुमला’ था। हमने सुविधा तो दे दी है, लेकिन यह कब कहा कि इस सेवा से किसी को कोई लाभ उठा पाएगा या नहीं?

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