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मैं जाकर दुश्मनों में बस गया हूं, यहां हमदर्द हैं दो-चार मेरे  डॉ. सलीम खान

मैं जाकर दुश्मनों में बस गया हूं, यहां हमदर्द हैं दो-चार मेरे
 डॉ. सलीम खान
मुनाफिकों ने हजरत आइशा पर तुहमत लगाई। सर्वशक्तिमान अल्लाह उसका खंडन करता है, ‘‘जान लो कि जिन लोगों ने तुहमत गढ़ी है वे तुममें से नहीं हैं’’। कहने का तात्पर्य यह है कि, तुहमत लगाने वालों के संगठित समूह ने लापरवाही, या अज्ञानतावश यह घृणित कदम नहीं उठाया है, बल्कि यह एक साजिश थी । लेकिन नबी करीम सल्ल. को बदनाम करने की कोशिश करने वाले उल्टा अपनी विश्वसनीयता गंवा बैठे । अपनी तमाम कड़वाहटों के बावजूद, यह त्रासदी उम्मत के लिए फलदायी साबित हुई। इससे पाखंडियों की पहचान हो गई। इस ‘बुराई’ का परिणाम ‘अच्छा’ निकला।
गो जरा सी बात पर बरसें के याराने गये
लेकिन इतना तो हुआ कुछ लोग पहचाने गये
अनुकूल परिस्थितियों में, पाखंडी हानिरहित होते हैं, लेकिन परीक्षा की घड़ी में उनसे खतरा बढ़ जाता है। इसलिए उनका पर्दाफाश हो जाना बहुत अच्छा है। उनके लिए, कुरआन के शब्दों में, केवल पाप का धब्बा बाकी रह गया, जबकि हमेशा के लिए साख खत्म हो गयी। इस घटना का एक फरीक अनजाने में मुनाफिकों का टूल बन जाने वाले आम मुसलमान हैं। मुसलमानों का बहुमत अपनी नेक नीयती के बावजूद, अज्ञानता और लापरवाही के कारण एक संगठित समूह के प्रतिनिधि बन गए।
समाज के लोगों को इतना मूर्ख नहीं होना चाहिए दुश्मनों की गढ़ी हुई बातों का जिक्र करते फिरें । ईमान वालों को इस्लाम के दुश्मनों द्वारा फैलाई हुई अफवाहों को नष्ट करना चाहिए। इस पर चुप्पी भी दुश्मन की योजना को विफल कर सकती है।
इस घटना के माध्यम से मुसलमानों की सादालौही दूर कर दी गयी, ताकि भविष्य में वे दुश्मनों का टूल न बनें।इस समय न केवल कश्मीर और एनआरसी पर झूठ फैलाया जा रहा है, बल्कि औरंगजेब जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर भी आरोप लगाया जा रहा है। कभी उन्हें शिवाजी का तो कभी अकबर का समकक्ष बताया जाता है। मोदी सरकार कश्मीर और एनआरसी पर अपने अत्याचार के धब्बे को मिटाने के लिए जैसे दावे कर रही है, उसी तरह की अफवाहें अंग्रेजों ने ईसाई धर्म के इतिहास पर लगे दाग को मिटाने के लिए की थी।
फातेह मिस्र हजरत अम्र बिन आस पर 600 साल बाद, यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने हजरत उमर से अलेक्जेंड्रिया में एक विशाल पुस्तकालय के बारे में पूछा, इसका क्या करना है। इसका उत्तर यह है कि यदि ये पुस्तकें कुरआन के अनुसार हैं, तो कुरआन हमारे लिए पर्याप्त है, और यदि उसके विरुद्ध हैं तो हमारे लिए किसी काम की नहीं है, इसलिए इन्हें जला दो। हजरत अम्र इब्न अस ने किताबों को जला दिया। बाद में, खुद मुसलमानों ने इन झूठी कहानियों को फैलाना शुरू कर दिया। मध्य युग के किसी शोधकर्ता और इतिहासकार ने जिसका उल्लेख भी नहीं किया गया था, वह झूठ कलेज के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया।
अल्लामा शिबली नोमानी इसका खंडन करते हैं। अंग्रेजों ने भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के बाद भारत के भीतर अपने मदरसों की स्थापना की और हिंदू और मुस्लिम बच्चों के मन में यह बात बिठाई कि मुसलमान ही वह कौम है जो पुस्तकों को जलाती है ”। अंग्रेजों के नक्शेकदम पर, चलते हुए संघ परिवार भी इतिहास को विकृत करने का कुप्रयास कर रहा है, लेकिन हमारे धार्मिक और राजनीतिक नेता इसका खंडन करने के बजाय इसका सर्मािन कर रहे हैं। जबकि अल्लाह का इरशाद है, “हे मुसलमानों! तुमको इस घटना (इफ्क) से सबक लेना चाहिए। कुरान पढ़ो इसकी व्याख्या करों ताकि आप इससे उपदेश ले सकें और दुश्मन की अफवाहों पर चर्चा न करते फिरो। ” यानी दुनिया के फायदे के लिए इस्लाम के दुश्मनों के टूल न बनो।

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