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आरबीआई: आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया डाॅ. सलीम खान

आरबीआई: आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया
डाॅ. सलीम खान

नोटबंदी के बाद, दिसंबर 2016 में राहुल गांधी ने कहा था, ‘‘देश का केंद्रीय बैंक नियमों में ऐसे ही बदलाव कर रहा है, जैसे प्रधानमंत्री अपने कपड़े बदलते हैं’’। राष्ट्रीय चुनाव में विफलता के बाद प्रियंका के बयान तो आते रहे, लेकिन राहुल गांधी को चुप लगी हुई थी। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड द्वारा बिमल जालान पैनल की सिफारिश को स्वीकार करने के एक दिन बाद, सरकार को लाभांश और अपशिष्ट भंडार से 1.76 लाख करोड़ रुपये के हस्तांतरण का फैसला करना पड़ा तो पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने निंदा करते हुए ट्वीट किया, ‘‘यह तो दवा की दुकान से बैंडेड चोरी करके गोली के घाव पर लगाने जैसा है।” इस संक्षिप्त वाक्यांश में, बैंडेड की चोरी और बंदूक की गोली का घाव पूरी कहानी बता देता है। राहुल ने पूछा, ‘‘प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री स्पष्ट करें कि वे अपनी लाई हुई आर्थिक तबाही को कैसे हल करेंगे?’’ उस स्पष्टीकरण से पहले, यह सवाल उठता है कि सरकार को यह अंतिम कदम उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? संयोग से इस प्रश्न का सबसे सरल उत्तर जीम 1967 में बनी फिल्म ‘तीन बहुरानियां’ के एक गीत में है जो आनंद बख्शी की कलम से निकला है:
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया!
भैया पूछों न हाल!
नतीजा ठन ठन गोपाल!
नतीजा ठन ठन गोपाल!!
वर्तमान में सरकार इसी हालत से जूझ रही है। यह सपनों की सरकार है। बड़े बड़े सपने देखती है। 5 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था, जिसका प्रधानमंत्री ने लाल किले से उल्लेख किया था, लेकिन उनको साकार करने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है और न ही आवश्यक सामग्री मौजूद है। सरकार की मजबूरी यह है कि योजना बनाने औ उसे कार्यांवित करने के लिए जिस बुद्धि और विवेक की आवश्यक होती है वह बाजार में नहीं बिकती है, लेकिन सरकार छल कपट और मक्कारी में समृद्ध है। निर्मला सीता रमण ने निचले सदन की बैठक के दौरान, 2019-20 के बजट में जिसका अनुमान लगाया था, कि उस दौरान 90,000 करोड़ रुपये का घाटा होगा, अर्थशास्त्री इस बात को लेकर चिंतित थे कि इतने बड़े पैमाने पर पैसा कहां से आएगा। कोई सोच भी नहीं सकता था कि रिजर्व बैंक से इतनी बड़ी रकम निकाल ली जाएगी। सरकार ने कुल 76,000 करोड़ रुपये निकाल कर सब को हैरान कर दिया है। सरकार की शतिराना चाल से आरबीआई के हाल पर जिगर मुरादाबादी का यह शेर सटीक बैठता है:
रग-रग में इस तरह वो समा कर चले गए
जैसे मुझी को मुझ से चुरा कर चले गए
यह पहली बार नहीं है कि मोदी सरकार ने ऐसा दुस्साहस किया है, बल्कि पिछले छह वर्षों में, हस्तांतरण 30,000 से 65,000 करोड़ के बीच सीमित रही। पिछले साल आरबीआई ने सरकार को 50,000 करोड़ रुपये दिए थे, जबकि वित्त वर्ष 2016-17 में केवल 30659 करोड़ रुपये ही से काम चल गया था। 2019 में मोदी सरकार की भारी सफलता के बाद, सरकार का दुस्साहस काफी बढ़ गया, इस बार उसने बड़ा हाथ मारते हुए पिछले पांच वर्षों में औसत 53,000 करोड़ रुपये से तीन गुना अधिक रकम छीन ली। दिलचस्प बात यह है कि 28,000 करोड़ रुपये पहले ही सरकार को हस्तांतरित किए जा चुके हैं। सरकार ने आरबीआई की मलाई खाने के लिए दिसंबर 2017 को पूर्व गवर्नर विमल जालान की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन किया था। पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल लाभांश के हस्तांतरण के खिलाफ थे, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान, आरबीआई बोर्ड ने जब सरकार के दबाव में एक समिति बनाने का फैसला किया तो निराश होकर पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उस समिति ने आरक्षित निधि को 6.8 प्रतिशत के मुकाबले 5.5-6.5 प्रतिशत रखने की सिफारिश कर दी। सरकार ने इस निचली सतह के अनुसार यह मोटी राशि ऐंठ ली। यदि यह कथित देश भक्त सरकार ने राष्ट्रीय खजाने की सुरक्षा के आधार पर उच्चतम स्तर, यानी 6.5 प्रतिशत का चयन किया होता, तो उसे केवल 11.608 करोड़ रुपये पर संतोष करना होता।
मोदी सरकार द्वारा रिजर्व बैंक से चुराया गया पैसा व्हाट्सएप पर प्रसारित होने वाली कहानी की याद दिलाता है। गाँव की भैंस चुराने की योजना बना रहे कुछ डाकुओं ने खुद को दो हिस्सों में बाँट लिया। एक चोर ने भैंस के गले में घंटी बांध दी और उसे उत्तर दिशा में ले गया। भैंस मालिक ने शोर मचाया और ग्रामीणों ने अपनी दूसरी भैंस को भूल कर घंटी की ओर दौड़ पड़े। इस हंगामे का फायदा उठाते हुए, दूसरे ग्रुप के अन्य आधे लोगों ने बाकी भैंसों को खोला और चुपचाप दक्षिण की ओर ले भागे। काफी दूर जाने के बाद, पहले वाले चोर ने भैंस के गले से घंटी खोल दी, और रफू चक्कर हो गया। जब ग्रामीण इस स्थान पर पहुंचे, तो उन्हें भैंस के बजाय घंटी मिली और यह भी नहीं पता था कि भैंस कहां गई। मोदी सरकार ने ऐसा ही किया चिदंबरम को पकड़कर और पूरे देश का ध्यान उनकी ओर आकर्षित करने और लोगों की लापरवाही का फायदा उठाकर बड़ी सफाई से रिजर्व बैंक की जेब काट ली।
संघी अर्थशास्त्री यह सपना दिखा रहे हैं कि इस कार्रवाई से बाजार में विश्वास बहाल होगा और आने वाले त्योहारी सीजन में मंदी की मार कम महसूस होगी। इस दावे में यह स्वीकारोक्ति मौजूद है कि मंदी से बाजार का विश्वास हिल गया है, और त्योहारों का वसंत पतझड़ ऋतु में बदल गया है। इस अनिश्चितता के लिए सरकार की नीति जिम्मेदार है। ये संकीर्ण मानािकता के लोग राजनीतिक हित में ही सभी फैसले लेते हैं और अपना वोट बैंक बढ़ाते हैं, जिससे जनता की जेब खाली हो जाती है।
आरबीआई की इस मोटी राशि में से कितन बाजार में जाएगा और कितन सरकारी खजाने में यह कोई नहीं जानता। लेकिन सरकार का आरबीआई पर दबाव डाल कर उसे अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना देश की स्थायी अर्थव्यवस्था के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। भविष्य के लिए, एक गलत उदाहरण सेट किया गया है जिसे हर भ्रष्ट सरकार द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक के बारे में यह दावा जोर-शोर से किया जा रहा है कि उसकी आय में अचानक नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है, इसलिए सरकार के लिए इससे पैसे लेना अनुचित नहीं है, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। आरबीआई द्वारा गठित समिति ने हाल ही में खुलासा किया है कि केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट नोटबंदी से प्रभावित हुई है। जालान कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट में औसत वार्षिक वृद्धि दर 9.5 प्रतिशत रही है, जबकि 2013-14 से 2017-18 तक पाँच वर्षों में औसत विकास दर घटकर 8.6 प्रतिशत रह गई है। समिति ने स्वीकार किया है कि में बैलेंस शीट की वृद्धि दर में कमी का कारण 2016-17 में लगाई गई नोटबंदी थी। दुनिया का सिद्धांत यह है कि यदि कोई व्यवसाय घाटे में जाता है, तो इसमें से रकम नहीं निकाली जाती है, लेकिन अपनी सरकार का रवैया इसके विपरीत है। इसे जल्द ही पांच प्रांतों में आयोजित होने वाले चुनावों में सफलता दर्ज करनी है। इसके चलते अगर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क हो जाए, तो सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं। इस अंधी सरकार का हाल तीन बहुरानियां के ऊपर वर्णित गीत के अंतिम टुकड़े जैसा है:
जो होगा देखा जाएगा
दो दिन मौज उड़ा ले
घर में बिजली नहीं तो क्या है
घर को आग लगा ले
भेला भला कौवा भूला
चला जो हंस की चाल
नतीजा ठन ठन गोपाल!
नतीजा ठन ठन गोपाल!!

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