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सोलह सौ करोड़ की बर्बादी का जिम्मेदार कौन?

सोलह सौ करोड़ की बर्बादी का जिम्मेदार कौन?

महमूद अहमद खान दरियाबादी

बहुत शोर सुनते थे हाथी की दुम का।

लीजिए 31 अगस्त को असम में एनआरसी की लिस्ट जारी हो चुकी है। वह सारे लोग हक्का बक्का है जो बरसों से चीख रहे थे कि असम में करोड़ो घुसपेठिए जो डेरा जमाए हुए बैठे हुए है उनकी पहचान कर उन्हें देश से निकाला जाए। इस चीख-पुकार में सिर्फ भाजपा के लोग ही नहीं थे बल्कि कांग्रेस और दुसरी पार्टियों के लोग भी शामिल थे आखिर नतीजा क्या हुआ ?

असम में सवा तीन करोड़ की आबादी है 2013 से अब तक सात बरसों में सोलह सो करोड़ रूपये खर्च करने के बाद जब पिछले साल एनआरसी की पहली लिस्ट आई जिसमें लगभग चालीस लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे लिस्ट में बेशुमार त्रुटियां थी शामिल नामों में भी स्पेलिंग की मिसटेक थी, कहीं तो बाप का नाम नहीं था और कहीं बेटे का नाम लापता था, बीवी के नाम की जगह बेटी का नाम और मां की जगह पर बीवी का नाम प्रकाशित था।जिस के बाद बहुत हंगामा बरपा हुआ। जिन लोगो के नाम शामिल नही थे उन्हें दस्तावेज जमा कराने के लिए समय अवधि दी गई। नाम को दुरुस्त कराने के लिए भी दस्तावेज जमा करवाए गए।

लोग सैकड़ों रुपये खर्च करके बड़ी मुश्किलों का सामना करते हुए दूर-दराज का सफर तय करते हुए एन आर सी सेन्टर पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से फाइनल लिस्ट जारी होने की तारीख 31 अगस्त दी गई थी। आखिरकार लिस्ट जारी हो चुकी है लेकिन वही ढाक के तीन पात। इस बार की लिस्ट में भी वही गलतियां हुई है जो पिछली लिस्ट में मौजूद थी। स्त्रीलिंग को पुल्लिंग बना दिया गया। एक ही खानदान के 4 लोगों के नाम नही है जबकि सबने एक जैसे दस्तावेज जमा कराए थे। इस बार एक ओर नई त्रुटि भी सामने आई है जिनके नाम पिछली लिस्ट में थे इस बार की लिस्ट से वो लोग गायब हो चुके है।

इस बार ऐसे लोगों की तादाद जिन का नाम लिस्ट में शामिल नहीं था 40 लाख से घटकर 19 लाख रह गई है।

दुसरी मजे की बात यह है कि इन 19 लाख में ज्यादातर यानी 12 लाख हिन्दु है सिर्फ सात लाख मुसलमान है, जिनमें से ज्यादातर ऐसे लोग है कि जिनसे दस्तावेज जमा करवाने या फार्म भरने में गलतियां हो गई थी, उन्हें चार महिने की ओर मोहलत दी गई है कि वह त्रुटियों को सही करवाए।

कहां तो गला फाड़ फाड़ कर करोड़ो मुसलमान घुसपेठियों की बात की जा रही थी, और निकले सिर्फ 7 लाख मुसलमान। और उम्मीद है कि इनमें से अक्सर लिस्ट में शामिल हो जाएंगे।

इस सूची के प्रकाशन के बाद साम्प्रदायिता फैलाने वाली ताकतों के चेहरों का रंग फीका पड़ गया है। शायद सरकार को पहले से ही इस बात का अन्दाजा था तभी सूची जारी होने के एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री ने तसल्ली वाले लहजे में कह चुके है कि जिनके नाम लिस्ट में नहीं है वो परेशान ना हो उनके लिए कोई रास्ता निकाला जाएगा।

असम के एक मंत्री ने बौखलाहट में आकर यह बयान तक दे डाला कि यह एनआरसी बकवास है यह हिन्दुओं के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश है।

अब सवाल यह है कि अगर यह एक साजिश है तो यह साजिश किसने रची? केन्द्र में भी भाजपा सरकार और राज्य में भी।

अगर आकड़ों के अनुसार 12 लाख हिन्दओं की जगह 2 लाख मुसलमान सूची से बाहर होते तो शायद माजरा ही कुछ ओर होता। पूरा मुल्क में खुशी की लहर दौड़ चुकी होती, खुब जश्न मनता और मिठाईयां बाँट रही होती।

इस मौके पर सोचने की जरुरत है कि असम की सिर्फ 3 करोड़ की आबादी  को शुमार करने में सात साल और सोलह सौ करोड़ रुपये खर्च हो गए(यानि एक आदमी पर तकरीबन साढे पांच सौ रुपये) फिर भी सही सूची नहीं आ सकी। अगर यही एनआरसी पूरे हिन्दुस्तान की 103 करोड़ की आबादी पर लागु की जाए तो कितना वक्त दरकार होगा? और तकरीबन 17 लाख करोड़ से ज्यादा का खर्चा।

हमारे मुल्क की मोजूदा सूरतेहाल यह है कि सरकार को दैनिक खर्च के लिए रिजर्व बैंक पर दबाव डालकर 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये हासिल करने पडे।

ऐसे हालात में क्या सरकार 17 लाख करोड़ खर्च करने का बेड़ा उठाने को तैयार है? आगे सवाल यह है कि अब क्या होगा? चार माह की मोहलत उन लोगों को दी गई है जिनके नाम सूची में नही है। चार महिने बाद दस्तावेज की जांच होगी, जांच में कितना समय लगेगा कुछ कहा नही जा सकता है। अन्दाजा है कि शायद साल डेढ़ साल लग जाए, फिर जो लोग रह गए है वो हाई कोर्ट का दरवाजा खटकाएंगें, शायद सुनवाई में फिर साल दो साल लग जाए, फिर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगेगी। एक अन्दाज के मुताबिक पाँच से छ साल का समय लग सकता है। और इन सालों में शायद सरकार बदलने की संभावना भी है, उस वक्त देश के क्या हालात होगें, क्या मुद्दे होंगे यह सब कुछ आने वाला वक्त ही तय करेगा।

फिलहाल एन आर सी की खेल खत्म हो चुका है फिर भी हिन्दुस्तानी होने के नाते हम सरकार से यह सवाल करने का हक रखते है कि असम में बर्बाद हुए सोलह सो करोड़ का जिम्मेदार कौन है?

 

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